नाभिदर्शना अप्सरा

जीवन्त साधकों की…..
जीवन्त साधना…
नाभिदर्शना अप्सरा

प्रेम, सौन्दर्य, मधुरता, रस, आनन्द साकार स्वरूप
प्रत्येक साधक के मन में अप्सरा साधना करने की इच्छा कभी न कभी जरूर होती है और हो भी क्यों न? शायद कोई पत्थर ही होगा जो रूप की अगाध राशि के दर्शन को लालायित नहीं होगा, सृष्टि में जो भी सत्य है, वह शिवमय है जिसमें भी शिव मौजूद हैं, वह सुन्दर है। अप्सरा तो रूप की खान है, एक ऐसा सौन्दर्य जो मृतप्रायः व्यक्तियों में भी प्राण और ऊर्जा का नया संचार कर दे। झील सी गहरी आंखें जिनमें प्रेम का भाव प्रतिपल डूबता और उतरता है, रस से भरे अधखुले अधर जिनके स्पर्श से जीवन की सारी त्रासदियां उड़नछू हो जाती हैं, फिर, विरला ही कोई साधक होगा जो ऐसी रूपसी सहचरी का कुछ क्षणों के लिये साथ नहीं चाहेगा। जीवन तो क्षणों में जीया जाता है, बाकी समय तो सिर्फ उत्तरदायित्त्व निभाने में खप जाता है।
हर कोई जो साधक है, उसके मन में सौन्दर्य का रस हिलोरें लेता है, बिना सौन्दर्य को जांचे-परखे कोई साधक साधना में ऊपर की ओर उठ नहीं सकता है क्योंकि साधक जिज्ञासु हैं। साधक सौन्दर्यबोध से ओत-प्रोत हैं और अप्सरा रूप की देवी हैं। विश्‍वामित्र ॠषि के तप को भंग कर दे, ऐसी अनिद्य सुन्दरी, मेनका सौन्दर्य की चरमोत्कर्ष परिभाषा है।
जब आप साधक बनते हैं, तब आप प्रकृति से जुड़ते हैं और प्रकृति में सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। उगते सूरज की लालिमा, खिलते पुष्पों केे रंगों में, सागर के जल की तरंगों में, तितलियों की चंचलता में, मोर के अहंकार में, बादल की सजलता में, नदी के कटाव में, इन सभी में सुन्दरता का वास है और अप्सरा में ये सारे तत्त्व एक जगह पर सिमट जाते हैं।
जब साधक के आह्वान पर अप्सरा आती हैं, तब इत्र में घुली श्‍वासों का उच्छवास, उन तीखे नयनों की धार, रुन-झुन करती पायल की झंकार और हर श्‍वास के साथ उठता-गिरता प्रेमासिक्त हृदय साधक को यौवन और जीवन का वरदान दे देती हैं। जीवन के सारे ताप शरद पूर्णिमा की रात उस रूपसी के रूप की चांदनी में शीतल हो जाते हैं, एक ऐसी तृप्ति मिल जाती है, जिसकी जन्मों से प्यास है।
आखिर स्वर्ग का मुख्य आकर्षण अप्सराएं ही तो हैं, यही आकर्षण तो मनुष्य से सारी जिन्दगी अच्छे काम कराता है, क्योंकि मृत्यु उपरांत उस सौन्दर्य की देवी जिसे अप्सरा कहते हैं, उनके दर्शन करने का सौभाग्य मिलेगा, पर मंत्रों में इतनी शक्ति निहित है कि उनके द्वारा अप्सरा को नियंत्रित किया जा सकता है।
जो कामना नर को खींच कर सुरपुर ले जाती है।
वही खींच लाती है, मिट्टी पर अम्बर वालों को।
कौन हैं अप्सरा?
अप्सराओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यह निश्‍चित तथ्य है कि समुद्र-मंथन में पहले रम्भा अप्सरा की उत्पत्ति हुई, और उसके पश्‍चात् अमृत घट और तत्काल पश्‍चात् भगवती लक्ष्मी प्रकट हुईं, इसलिए अप्सराओं का महत्व अन्य रत्नों की अपेक्षा अत्यधिक है। रूप, रस और जल तत्व प्रधान होने के कारण ही इनका नाम अप्सरा पड़ा और इनके गुण देवताओं के गुणों के समान ही पूर्ण रूप से प्रभावशाली हैं।
ये भी कहा जाता है कि इन्द्र ने 108 ॠचाओं की रचना करके इन अप्सराओं को प्रकट किया। रम्भा के अलावा जिन अन्य अप्सराओं का वेदों और पुराणों में जिक्र आता है, उनके नाम हैं उर्वशी, मेनका, और तिलोत्तमा।
साधना-पथ में साधक अपने मन पर नियंत्रण चाहता है जिससे कि वह अपने अंतर्मन में उतर कर मनन कर सके, पर मन में तो कामनाएं बसती हैं और वे मूलतः प्रेम-जनित होती हैं। अब हृदय अर्थात् उर में जो बस जाती है, उसे उर्वशी कहते हैं और उर्वशी तो हम सबके मन में है। उर्वशी-जनित भाव के कारण ही तो प्रेम की तरंगें मन में उठती हैं और प्रीत में किसी प्रकार की बंदिश नहीं होती। शरद पूर्णिमा की रात जब आसमान से चांदनी की शीतल किरणें भी प्रेम में संतप्त युगलों को दग्ध कर देती हैं, उस रात्रि में नाभि दर्शना अप्सरा साधकों के आह्वान पर सुरपुर से धरती पर आती है।
ब्रह्म साधना से भी आवश्यक और उसे करने से पूर्व अप्सरा साधना साधक को करनी चाहिए।
नाभिदर्शना अप्सरा –
सौन्दर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति, वय में षोडशी और कोमलता से लबालब कमनीय शरीर जो अपने यौवन से इतराया और प्रेम से सिंचित है। प्रतिपल भीनी खुशबू में नहाया तन नाभि-दर्शना के आने की सूचना देता है। इस अप्सरा की काली और लम्बी आंखें, लहराते हुए झरने की तरह केश और चन्द्रमा की तरह मुस्कुराता हुआ चेहरा, कमल नाल की तरह लम्बी बांहें और सुन्दरता से लिपटा हुआ पूरा शरीर एक अजीब सी मादकता बिखेर देता है, और इन्हें इन्द्र का वरदान प्राप्त है, कि जो इसके सम्पर्क में आता है, वह पुरुष पूर्ण रूप से रोगों से मुक्त होकर चिर यौवनमय बन जाता है, उनके शरीर का कायाकल्प हो जाता है, और पौरुष की दृष्टि से वह अत्यन्त प्रभावशाली बन जाता है।
साधना विधान
यह रात्रिकालीन साधना है, इस साधना को रात्रि में 10 बजे के पश्‍चात् सम्पन्न करना चाहिये।
नाभिअप्सरा साधना साधक अपने घर में या किसी भी अन्य स्थान पर एकांत में सम्पन्न कर सकता है।
इस साधना में बैठने से पूर्व साधक स्नान कर सुन्दर, सुसज्जित वस्त्र पहनें एवं अपने वस्त्रों पर सुगन्धित इत्र का छिड़काव करें।
साधक उत्तर दिशा की ओर मुंह कर आसन पर बैठें।
इस साधना में सुगन्धित पुष्पों का प्रयोग करना चाहिये। साधक साधना से पहले ही दो सुगन्धित पुष्पों की माला की व्यवस्था कर लें।
सर्वप्रथम अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरुचित्र स्थापित कर, पंचोपचार गुरु पूजन सम्पन्न करें। गुरुदेव से साधना में सफलता का आशीर्वाद प्राप्त कर, मूल साधना सम्पन्न करें –
बाजोट पर एक ताम्र पात्र में अद्वितीय ‘नाभि दर्शना महायंत्र’ को स्थापित करें।
केशर से यंत्र पर तिलक कर यंत्र का सुगन्धित पुष्पों, इत्र, कुंकुम इत्यादि से पूजन करें।
यंत्र के सामने सुगन्धित अगरबत्ती एवं शुद्ध घृत का दीपक लगावें।
इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि ‘मैं अमुक नाम, अमुक पिता का पुत्र, अमुक गौत्र का साधक नाभि दर्शना अप्सरा को प्रेमिका रूप में सिद्ध करना चाहता हूं, जिससे कि वह जीवन भर मेरे वश में रहे, और मुझे प्रेमिका की तरह सुख आनन्द एवं ऐश्‍वर्य प्रदान करे। ’
इसके बाद ‘नाभि दर्शना अप्सरा माला’ से निम्न मंत्र जप सम्पन्न करें, इसमें 21  माला मंत्र जप उसी रात्रि को सम्पन्न हो जाना चाहिए।
॥ ॐ ऐं श्रीं नाभिदर्शना अप्सरा प्रत्यक्षं श्रीं ऐं फट्॥
अगर बीच में घुंघरूओं की आवाज आवे या किसी का स्पर्श हो, तो साधक विचलित न हों और अपना ध्यान न हटावें, अपितु 21 माला मंत्र जप एकाग्रचित्त होकर सम्पन्न करें, इस साधना में जितनी ही ज्यादा एकाग्रता होगी, उतनी ही ज्यादा सफलता मिलेगी।
21 माला मंत्र जप पूरी एकाग्रता के साथ सम्पन्न करने के पश्‍चात् अप्सरा माला को साधक स्वयं के गले में डाल दें। तथा सुगन्धित पुष्पों की एक माला को यंत्र पर चढ़ा दे तथा दूसरी माला भी स्वयं के गले में डाल दें।
मंत्र जप की पूर्णता पर साधक को यह आभास या प्रत्यक्ष होने लगता है कि अप्सरा घुटने से घुटना सटाकर बैठी है। जब साधक को यह आभास या प्रत्यक्ष हो जाएं तो साधक नाभि दर्शना अप्सरा से वचन ले लें कि मैं जब भी अप्सरा माला से एक मंत्र जप करूं, तब तुम्हें मेरे सामने उपस्थित होना है, और मैं जो चाहूं वह मुझे प्राप्त होना चाहिए, पूरे जीवन भर मेरी आज्ञा का उल्लंघन न हो।
तब नाभि दर्शना अप्सरा साधक के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन देती है, कि मैं जीवन भर आपकी इच्छानुसार कार्य करती रहूंगी।
तब इस साधना को पूर्ण समझें, और साधक अप्सरा के जाने के बाद अपने साधना स्थल से उठ खड़ा हो।
साधक को चाहिए कि वह इस घटना को केवल अपने गुरु के अलावा और किसी के सामने स्पष्ट न करें, क्योंकि साधना ग्रन्थों में ऐसा ही स्पष्ट उल्लेख आया है।
साधना सम्पन्न होने पर नाभिदर्शना अप्सरा महायंत्र को अपने घर में किसी गोपनीय स्थान पर रख दें, जो गले में अप्सरा माला पहनी हुई है, वह भी अपने घर में गुप्त स्थान पर रख दें, जिससे कि कोई दूसरा उसका उपयोग न कर सके।
जब भी नाभिदर्शना अप्सरा को बुलाने की इच्छा हो, तब इस महायंत्र के सामने अप्सरा माला से उपरोक्त मंत्र की एक माला जप कर लें, अभ्यास होने के बाद तो यंत्र या माला की आवश्यकता भी नहीं होती, केवल मात्र सौ बार मंत्र उच्चारण करने पर ही प्रत्यक्ष प्रकट हो जाती हैं।
इस साधना को स्त्रियां भी सिद्ध कर सकती हैं, नाभि दर्शना अप्सरा के रूप में उन्हें अभिन्न सखी प्राप्त हो जाती है, और उस सखी के साहचर्य से साधिका के शरीर का भी कायाकल्प हो जाता है, और ऐसी साधिका अत्यन्त सुन्दर, यौवनमय और सम्मोहक बन जाती हैं।
वास्तव में ही यह साधना बालक या वृद्ध किसी भी वर्ण या जाति का व्यक्ति या स्त्री सम्पन्न कर सकते हैं, और यदि विश्‍वास एवं श्रद्धा के साथ इस साधना को सम्पन्न करें, तो अवश्य ही पूर्ण सफलता मिलती है
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